MP वक्फ बोर्ड हिंदू सदस्य: मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार ने राज्य वक्फ बोर्ड का पूरी तरह पुनर्गठन करते हुए एक नई कार्यकारिणी का गठन किया है, जिसमें पहली बार दो हिंदू (गैर-मुस्लिम) सदस्यों — मनोज मालपानी और अनिमेष भार्गव — को शामिल किया गया है। सरकारी राजपत्र में जारी अधिसूचना के अनुसार, नए बोर्ड में डॉ. सनवर पटेल को दोबारा अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, और कुल मिलाकर बोर्ड में अध्यक्ष व आयुक्त समेत 9 से 10 सदस्य शामिल हैं।
यह बदलाव क्यों हुआ
यह पुनर्गठन वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के प्रावधानों के तहत किया गया है, जिसे 5 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिली थी। यह विधेयक संसद के दोनों सदनों में लंबी और तीखी बहस के बाद पारित हुआ था। इस नए कानून में राज्य वक्फ बोर्डों में कुछ गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान जोड़ा गया है। मध्य प्रदेश इस प्रावधान को व्यवहार में लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है।
विपक्ष की आपत्ति
कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद, जो अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से भी जुड़े हैं, ने इस पुनर्गठन पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका मुख्य तर्क यह है कि वक्फ संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं अभी भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं, और जब तक अदालत का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक राज्य सरकार को इस तरह की नियुक्तियां करने से बचना चाहिए था। मसूद ने यह भी सवाल उठाया कि कानून में सिर्फ दो गैर-मुस्लिम सदस्यों का प्रावधान था, जबकि इस मामले में उनकी संख्या ज्यादा बताई जा रही है। उन्होंने ऐलान किया कि वे इस पुनर्गठन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।
पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने भी इस फैसले की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सरकार असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के कदम उठा रही है। कुछ मुस्लिम संगठनों ने भी इस नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए कहा कि वक्फ प्रणाली की गहरी समझ रखने वालों को ही बोर्ड में शामिल किया जाना चाहिए था।
सरकार और सत्तारूढ़ दल का जवाब
वक्फ बोर्ड अध्यक्ष सनवर पटेल ने स्पष्ट किया है कि यह नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही की गई है, और नियुक्त हिंदू सदस्य पदेन (एक्स-ऑफिशियो) क्षमता में शामिल हैं। राज्य मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य है जिसने वक्फ अधिनियम को इस रूप में लागू किया, और इसका स्वागत होना चाहिए। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने भी विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह किसी धार्मिक निकाय का नहीं, बल्कि एक वैधानिक (स्टैच्यूटरी) निकाय का पुनर्गठन है, जिसका दायरा प्रशासनिक है।
धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रिया
इस फैसले को लेकर धार्मिक संगठनों के बीच भी मतभेद देखने को मिले हैं। कुछ हिंदू संगठनों ने इस कदम को संवैधानिक और आवश्यक बताया है, जबकि कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसे लेकर असहमति जताई है और भोपाल के कुछ इलाकों में इसके विरोध में प्रदर्शन भी हुए हैं।
कानूनी स्थिति क्या है
गौरतलब है कि वक्फ संशोधन अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाएं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कई पक्षों की ओर से पहले से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हैं, और मामले की सुनवाई चल रही है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने अदालत को भरोसा दिलाया था कि जरूरत पड़ने पर आवश्यक बदलाव किए जाएंगे। अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में नई नियुक्तियों पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है, जिसके आधार पर राज्य सरकार का कहना है कि यह पुनर्गठन पूरी तरह वैध प्रक्रिया के तहत हुआ है।
आगे क्या होगा
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की जाने वाली संभावित याचिका पर अदालत का क्या रुख रहता है, और क्या यह मामला वक्फ अधिनियम की मुख्य सुनवाई से जुड़ जाता है। चूंकि मध्य प्रदेश पहला राज्य है जिसने यह कदम उठाया है, इसलिए अन्य भाजपा-शासित राज्यों में भी इसी तरह के पुनर्गठन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जो आने वाले समय में इस मुद्दे को और बड़ा बना सकता है।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में हिंदू सदस्यों की नियुक्ति ने एक नई कानूनी और राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। यह विवाद सिर्फ राज्य की राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि वक्फ संशोधन अधिनियम की सुप्रीम कोर्ट में चल रही व्यापक सुनवाई से भी सीधे जुड़ा है। आने वाले दिनों में अदालत के रुख से यह साफ होगा कि इस तरह के राज्य-स्तरीय फैसलों की संवैधानिक वैधता कितनी मजबूत है।

