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US-Iran तनाव और बढ़ा: अमेरिका के 3 दौर के हमले, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद, खाड़ी देशों तक पहुंची आंच

US Iran war update: अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष बीते कुछ दिनों में और ज्यादा भीषण रूप ले चुका है। अमेरिकी सेना ने ईरान पर तीसरे दौर के हमले किए हैं, जिसमें एक ही दिन में करीब 140 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, बीते तीन दौर के हमलों को मिलाकर अब तक कुल 300 से ज्यादा ठिकानों पर कार्रवाई की जा चुकी है।

ताजा हमलों की वजह

अमेरिका का कहना है कि यह ताजा कार्रवाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में एक मालवाहक जहाज पर हुए हमले के जवाब में की गई है। CENTCOM के अनुसार, इस बार के हमलों में मिसाइल और ड्रोन ठिकाने, नौसैनिक क्षमताएं, गोला-बारूद भंडारण केंद्र, संचार नेटवर्क और तटीय निगरानी केंद्रों को निशाना बनाया गया।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद

ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड नौसेना ने ऐलान किया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अगले आदेश तक पूरी तरह बंद कर दिया गया है। ईरानी मीडिया के अनुसार, गार्ड ने दावा किया कि एक वाणिज्यिक जहाज तय रास्ते से हटकर चल रहा था, जिसे चेतावनी के तौर पर एक गोली दागकर रोका गया। ईरान ने यह भी चेतावनी दी है कि अमेरिका या उसके सहयोगियों की किसी भी जवाबी कार्रवाई का “कड़ा जवाब” दिया जाएगा।

इस बंदी के बावजूद पिछले 24 घंटों में इस जलमार्ग से करीब 15 वाणिज्यिक जहाज गुजरे हैं, हालांकि आवाजाही पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है।

US Iran war update:

खाड़ी देशों तक पहुंची आंच

तनाव अब सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहा। संयुक्त अरब अमीरात के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि उसने मिसाइल और ड्रोन हमलों का जवाब दिया है, और देश के हवाई सुरक्षा तंत्र ने कई बैलिस्टिक व क्रूज मिसाइलों को हवा में ही रोक दिया। वहीं बहरीन के गृह मंत्रालय ने हवाई हमले के सायरन बजने की पुष्टि करते हुए नागरिकों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की। इससे पहले ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी हमला करने का दावा किया था।

सीजफायर पूरी तरह खत्म

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच हुआ संघर्षविराम अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ईरान के साथ बातचीत जारी रखने पर सहमत है। इस बीच अमेरिका ने ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए हैं।

ईरान का रुख

ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाकर कालिबाफ ने कहा है कि उनका देश अभी भी अमेरिका पर भरोसा नहीं करता, लेकिन बातचीत जारी रखना जरूरी मानता है। उन्होंने यह भी दोहराया कि यह संघर्ष कभी भी ईरान के आत्मसमर्पण के साथ खत्म नहीं होगा, और जरूरत पड़ने पर देश पूरी ताकत से अपना बचाव करेगा।

नए सुप्रीम लीडर का पहला बयान

फरवरी में हुए हमले में मारे गए ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के कई दिनों बाद, उनके उत्तराधिकारी की ओर से पहला आधिकारिक बयान ईरानी सरकारी टीवी पर पढ़ा गया, हालांकि इसके साथ कोई ऑडियो या वीडियो जारी नहीं हुआ। अंतिम संस्कार के दौरान भी नया सुप्रीम लीडर सार्वजनिक रूप से कहीं नजर नहीं आया।

मध्यस्थता की कोशिशें जारी

क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ने के साथ, पाकिस्तान और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों के बीच भी बातचीत हुई, जिसमें दोनों ने हालिया तनाव पर गहरी चिंता जताई। पाकिस्तान इस पूरे विवाद में एक अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है — पिछले महीने हुए समझौते को “इस्लामाबाद मेमोरेंडम” नाम दिया गया था, जो पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका को मान्यता देता है।

वैश्विक असर

इस तनाव का सीधा असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। शेयर बाजारों में गिरावट देखी गई, खासकर तेल और गैस टैंकरों पर हमलों की खबरों के बाद। अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत भी बीते एक साल के मुकाबले करीब 70 सेंट प्रति गैलन ज्यादा हो चुकी है, और आने वाले दिनों में इसके और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

भारत के लिए क्यों अहम

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भारत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात होता है। इस जलमार्ग के बंद होने और आवाजाही घटने का सीधा असर आने वाले समय में भारत में ईंधन की कीमतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में रह रहे भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता और बढ़ गई है, खासकर बहरीन और कुवैत जैसे देशों में जहां सीधे हमलों की खबरें आई हैं।

US Iran war update:

निष्कर्ष

अमेरिका-ईरान संघर्ष अब सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र को अपनी चपेट में ले चुका है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना, यूएई और बहरीन पर हमले, और सीजफायर का टूटना — यह सब मिलकर इस क्षेत्र को एक बेहद अस्थिर मोड़ पर ले आए हैं। पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे मध्यस्थों की कोशिशें कितना असर दिखाती हैं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।

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