नारी शक्ति वंदन अधिनियम — 2029 चुनाव में मिलेगा महिलाओं को आरक्षण?

2023 में जब नई संसद भवन का उद्घाटन हुआ था, तब सर्वसम्मति से पारित होने वाला पहला कानून था नारी शक्ति वंदन अधिनियम। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई, यानी 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित होनी थीं। यह भारतीय संसदीय इतिहास में महिला प्रतिनिधित्व से जुड़ा अब तक का सबसे बड़ा फैसला माना गया था। लेकिन कानून में एक अहम शर्त जोड़ी गई थी — यह आरक्षण परिसीमन के बाद ही लागू होगा, और परिसीमन जनगणना पूरी होने के बाद ही किया जा सकेगा। यही शर्त आज तक इस कानून को अमल में आने से रोक रही है।

क्यों नहीं लागू हुआ अभी तक

मूल योजना के अनुसार जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे टालना पड़ा। अब 2026 में जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो रही है, जिसमें इस बार जाति गणना को भी शामिल किया जाएगा। जनगणना पूरी होने के बाद परिसीमन आयोग नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करेगा, और उसके बाद ही महिला आरक्षण को व्यवहार में लाया जा सकेगा। यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम की पूरी सफलता तीन बड़ी प्रक्रियाओं — जनगणना, परिसीमन और फिर आरक्षण के क्रियान्वयन — पर निर्भर करती है। अगर यह पूरी प्रक्रिया समय पर पूरी होती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिल सकता है।

कितनी सीटें मिलेंगी महिलाओं को

अगर लोकसभा में मौजूदा 543 सीटें ही बरकरार रहती हैं, तो इनमें से करीब 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। वहीं अगर परिसीमन बिल के प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 850 हो जाती है, तो महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़कर लगभग 283 तक पहुंच जाएगी। यह भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के लिहाज से एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है। इससे न सिर्फ लोकसभा बल्कि राज्यों की विधानसभाओं में भी महिला प्रतिनिधित्व में भारी इजाफा होगा।

कानून में यह भी प्रावधान है कि आरक्षित सीटें स्थायी नहीं होंगी, बल्कि हर परिसीमन के बाद रोटेट यानी बदलती रहेंगी, ताकि देश के अलग-अलग हिस्सों की महिलाओं को बारी-बारी से प्रतिनिधित्व का मौका मिल सके।

विपक्ष का क्या कहना है

विपक्षी दल सैद्धांतिक रूप से महिला आरक्षण के विरोध में नहीं हैं — बल्कि ज्यादातर पार्टियों ने संसद में इस कानून के पक्ष में वोट भी दिया था। हालांकि उनकी चिंता इसके क्रियान्वयन के तरीके को लेकर है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण जैसे लोकप्रिय मुद्दे की आड़ में परिसीमन को आगे बढ़ाना चाहती है, जो जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों की मांग है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करके पहले ही लागू कर दिया जाना चाहिए, ताकि दक्षिण भारत की सीटों में कमी का डर पैदा किए बिना महिलाओं को उनका हक मिल सके।

सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि कानून में परिसीमन की शर्त संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है, और इसे अलग करना तकनीकी और कानूनी रूप से जटिल होगा। सरकार यह भी दावा करती रही है कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया तय समय-सीमा में पूरी की जाएगी। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, संबंधित मंत्रालय इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं ताकि कोई अनावश्यक देरी न हो और महिलाओं को समय पर उनका संवैधानिक अधिकार मिल सके।

निष्कर्ष

नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन इसका असली असर तभी दिखेगा जब जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया समय पर पूरी होगी। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चला, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भारतीय संसदीय इतिहास में महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से एक नया अध्याय लिख सकता है। आने वाले महीनों में जनगणना और परिसीमन से जुड़े हर बड़े अपडेट के लिए जुड़े रहें।

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